सपाटबयानी

मेरे विचार - प्रतिक्रिया

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pitamberthakwani


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हमारा देश

Posted On: 16 Jul, 2016  
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आज का मनुष्य

Posted On: 11 Mar, 2013  
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आज फिर जीने की तमन्ना है!

Posted On: 4 Feb, 2013  
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दिल्ली का बीमार होता दिल !

Posted On: 22 Jan, 2013  
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नाकाम यू पी की सरकार

Posted On: 15 Jan, 2013  
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युवा नेता नाकाम !

Posted On: 5 Jan, 2013  
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बहुरानियों की शापिंग!

Posted On: 4 Jan, 2013  
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फांसी होने का दरवाजा खोलें!

Posted On: 26 Dec, 2012  
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‘विलेन’ से ‘नायक’ और ‘विदूषक’ तक!!

Posted On: 19 Nov, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय पीताम्बर जी, नमस्कार! मुझे बहुत दुःख हुआ आपकी संवेदना को समझ कर ... महोदय, मैंने तो मजाक में ऐसा कहा था और तथाकथित ढोंगी बाबा ऐसा ही कहते ... मेरा अभिप्राय यही था साथ ही मैंने 'ओ माय गॉड' भी कहा था, जिस फिल्म की आप प्रशंशा करते नहीं थकते. उस फिल्म के ढोंगी बाबा क्या ऐसा नहीं कहते? आशा है आप मेरी बातों से आश्वस्त हो गए होंगे. आज मैंने मेल में आपकी संवेदना और भावुकता देखी तो जवाब देने बैठ गया. मैंने दुबारा आपके जवाब को नहीं देखा था. समय की कमी के चलते हर ब्लॉग पर बार बार नहीं जा सकता था! अभी भी अगर आपको मुझसे कोई शिकायत हो तो जरूर लिखें ... आपकी साफगोई काबिले तारीफ है! पुन: माफी चाहूँगा अगर आपको कुछ भी अप्रिय लगा हो!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

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आदरणीय               सादर, क्षमा सहित यह कहना चाहूँगा कि मैंने परतंत्रता नहीं कहा है,कह भी देता किन्तु वह तब एक लम्बी बहस का कारण होता. मैंने अधिक स्वतंत्रता कहा है, यदि आप इतिहास के आईने में देखें तो पहले बहुएँ एक हाथ भर लंबा घूँघट निकालती थीं, कुछ समाजों में नौ गज कि साडियां पहनती थीं क्या आप आज ये सब देख पाते हैं? शायद नहीं! बाद में और भी बदलाव आये संयुक्त परिवार से एकल परिवार ये सब साफ़ दर्शाते हैं कि वक्त के साथ अधिक स्वतंत्रता कि चाहत बढ़ी है और इसी के साथ आगे क्या होगा इसकी चिंताएं भी. आपने सत्तर के दशक में एक गीत अवश्य सुना होगा इक तारा बोले तुन तुन............. उसकी एक पंक्ति थी कपड़ा तन से घटता गया फिर उसके बाद.... इससे स्पष्ट है कि यह चिंता काफी पुरानी है. मैं नग्नता का पक्षधर बिलकुल भी नहीं हूँ किन्तु इस बात को भलीभांति समझता हूँ कि वक्त के साथ बदलाव अवश्य आते हैं. हाँ समाज में बुराई जब प्रवेश करने लगे तो बड़े बूढों का यह दायित्व है कि वे नयी पीढ़ी को सही गलत का फर्क समझाएं. पुनः एक बार कहूँगा कि मैंने यह अपनी बात को थोड़ा स्पष्ट करने के उद्देश्य से लिखा है यदि आपकी भावनाएं आहत हुई हों तो मै क्षमा प्रार्थी हूँ.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

सादर प्रणाम!................ ".........हाँ अगर रावण को जलाने से यह अर्थ लिया जाए की अपने अन्दर के रावण को जलाना! अपने अन्दर की दूषित प्रव्र्तियो को जलाना है, जिसके तहत आजकल के असामाजिक तत्व बलात्कार और समाज में तमाम बेहूदा काम करते है तो इसे सही माना जा सकता है......................" सच कहा आपने निश्चय ही यह हम सबके अन्दर का ही रावण है जिसे बाहरी रूप में जलाकर प्रदर्शित करते हैं की रावण मर चूका और राम हमारे बिच जिन्दा है ..........हकीकत तो यह है कि यह सब दिखा इसलिए ताकि राम के आड़ में हम अपने अन्दर रावण को जिन्दा रख सके.........अब तो धर्म और भगवन भी पुरतः व्यवसायीकरण का अंग हो गया..............कुछ समय पहले एक रचना पोस्ट कि थी मैंने ............कृपया आप इसे अवलोकन करना चाहें.............. http://merisada.jagranjunction.com/2012/02/06/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a4%be/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरनीय पीताम्बर जी,,सर्वप्रथम आभार आपका आपने अपनी सूची में सम्मिलित किया,आपको बधाई आप स्वदेश लौट रहे हैं,सीखने की प्रक्रिया तो ऐसी है जिसमें हर कोई किसी न किसी से कुछ सीखता ही है,यहाँ तक की बच्चे कई बार मार्गदर्शक होते हैं,उदाहरणार्थ ब्लॉग लेखन मैंने अपने पुत्र के प्रोत्साहन से ही प्रारम्भ किया.कंप्यूटर से सम्बन्धित बहुत सी जानकारी या तो अपने बच्चों से या जागरण मंच के युवा बंधुओं से ली. आपने दिल्ली में रहते हुए बिजली की समस्या बताई है,कृपया बदनाम मत करिए अपने देश को हम तो बहुत छोटे से शहर में रहते हैं फिर भी ईश्वर कृपा से नेट और बिजली न होने पर इनवर्टर हर समय सबके सम्पर्क में रहने में सहायक होता है.दिल्ली में तो संभवतः बिजली की रोस्टिंग इतनी है भी नहीं.आप यहाँ रहते हुए भी अपना कार्य सुचारू रूप से कर सकते हैं.शुभकामनाएं

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

पीताम्बर जी ; मैं आपकी एमोसन को अच्छी तरह से महसूश कर सकता हूँ | मेरे हिसाब से इसके कई कारन और कई पहलू हैं | मुख्य कारन दो हैं - आर्थिक ;- हमारा देश एक प्राचीन समृद्ध सांस्कृतिक देश है, emotions इसका एक बिशिस्ट गुण रहा है | परन्तु बड़ती जन संख्या ने अनेकों असुन्तलनों को कब जन्म दे दिया किसी को पता ही नहीं लगा | और हम सब उस दौड़ मैं शामिल होगये जिसने हमें स्वयं केन्द्रित बना दिया | ज़मीन कम होती गयी ,परिवार टूटते गए | - सामाजिक ;- कुछा ऐसा हुआ की सयाने लोगों का परिवारों मैं महत्व उम्र के साथ गिराने लगा ; परिवार की लीडरशिप कमजोर होगई | सयाने लोगों को कोई सोशल सिक्यूरिटी नहीं विकसित हो पाई | इन्हीं कारणों से बिखराव हर तरफ आगया और हमारी पुराणी ब्यस्था चरमरा गयी | पीताम्बर जी यह सब सर्ब ब्याप्त परिवर्तन का हिस्सा है | शायद ऐसा ही होना प्रकृति को भी मंजूर है | भुवन

के द्वारा: bhuwan19 bhuwan19

अभिभूत हो जाता हूँ श्री जे एल सिंह जी , आपकी बातों और विचारों से! हमें विक्सित होने में फायदे के बदले नुकसान ज्यादा है चाहे इसे वरिष्ठ नगरीक की ही सोच क्यों न समझे? मै ६-६ माह के लिए ही आता हूँ यहाँ, वह भी अपने बेटे के आग्रह के कारण बेटा शायद सोचता होगा की जीवन का क्या भरोसा कब क्या हो जाए? अब तो नवम्बर में आने के बाद फिर नहीं यहाँ आऊंगा, एक बार इस बेहतरीन देश को देखने की इच्छा थी सो देखा लिया बस! मैं सोचता हूँ की चाहे संस्कार अपने ही बेहतर क्यों न हों पर 'लाईफ- स्टाईल' जो यहाँ है वह भारत में न हो साकती है और न होगी! अपने वतन की बात तो अलग ही है, भावावेश के कारण आपसे खुल गया,आपका समय खराब किया! क्षमा चाहूंगा!

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

एक बात मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि आप महाराज दशरथ और रानी कैकेई को कैसे दोषी मानते हैं? जिसने हमें जन्म दिया है वो हमारे प्राण भी ले सकता है, फिर तो रानी कैकेई ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था. क्या राजधनी से दूर जंगलो में बसे साधुओ की सुरक्षा राजा की जिम्मेदारी नहीं वही करने के लिए राम को वन भेजा गया था, इसका विस्तृत उल्लेख श्री आनंद रामायण में मिलता है. एक पुत्र के लिए उसके माता-पिता ही ईश्वर हैं तो फिर राम के लिए कोई दूसरा ईश्वर कैसे हो सकता था? एक आदर्श पुत्र का कर्तव्य है कि यदि उनके माता-पिता उन्हें वन भेजते हैं तो वो खुशी खुशी स्वीकार कर ले, महाराज दसरथ ने तो राम से विनती भी की थी कि तुम मेरा कहना न मानो और अयोध्या में रहो. इस बात को आज्ञा समझ राम ने शिरोधार्य क्यों नहीं किया? क्योंकि इससे उनके पूज्य पिता की कीर्ति धूमिल होती है. यहाँ पर दंड का कोई स्थान नहीं, वरन अपने इस कार्य से राम ने एक आदर्श पुत्र का कर्तव्य निभाया है. प्रतिक्रिया लंबी हो गई मेरी धृष्टता क्षमा करें. इसी सब दृष्टि को से लिखा गया मेरा आलेख पढ़े- सीता परित्याग राज-धर्म या राज-मोह सच्चा ईश्वर सच्चा ईश्वर भाग-2 अगर आप इसे पढ़ना चाहता हैं तो मेरे ब्लॉग पर आकर सबसे पहली कविता पर पहुंचना होगा, क्योंकि यूआरएल लिखने पर प्रतिक्रिया नहीं हो पा रही है. क्षमा करें.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आदरणीय सादर अभिवादन! बहुत ही आश्चर्य हो रहा है आपका लेख पढकर. अब एक ज्ञानी अपने से छोटे (शिष्यों) से ही अपना संदेह् प्रकट कर रहा है. ऐसा लगता है मानो आपने हमें सम्मान देने का वीणा उठाया है. हम आपके आभारी... यद्यपि आप मुझसे बड़े हैं उम्र में अनुभव में ज्ञान में हर एक क्षेत्र में आप मेरे आदरणीय हैं, और आपके प्रश्न का समुचित उत्तर श्री चातक जी ने दिया है, उस पर आपका तर्क सराहनीय है श्री मान इस मंच के शशि श्री शशि भूषण जी ने भी अपने विचारों से हमे अवगत कराया है. मैं जानता हूँ यहाँ मेरे जैसे किसी अल्पज्ञ छोटे बच्चे का बोलना उचित नहीं तथापि केवल अपनी उपस्थिति मात्र दर्ज करवा रहा हूँ, कृपया से मेरा उत्तर न समझे- "जैसा कि चातक जी ने आपके किन्ही प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया है और उनकी इच्छा थी कि उन प्रश्नों का उत्तर आप खुद दे, फिर भी उनके विचारों की अवज्ञा कर रहा हूँ आशा है हमें क्षमा करेंगे." मैं केवल आपका ध्यान यहाँ आकर्षित करना चाहूँगा- "अपनी पत्नी सीता-------------------------से उचित माना जाना चाहिए// आपका संदेह, निसंदेह सत्य है, कि राम ने केवल एक स्त्री के लिए अनेको महिलाओ को विधवा कर दिया, परन्तु इसका दूसरा स्वरुप आपने ध्यान दिया. ऐसा कर उन्होंने ने केवल अपने कुल-परंपरा की रक्षा की वरन सम्पूर्ण विश्व के नारीजाति का सम्मान बढ़ाया. इसके बाद लोगो को शिक्षा मिली कि कोई भी अगर किसी नारी का बलपूर्वक हरण करता है तो उसकी भी रावण जैसी दुर्दशा होगी. जहाँ तक "जन" कल्याण का प्रश्न है तो कोई भी कितना भी ज्ञानी हो, वीर हो परन्तु अधर्म के साथ है तो उसका विनाश निश्चित है. अधर्म का साथी भी दोषी होता है जैसे- लंका वासी, भीष्म, कर्ण, द्रोणाचार्य और अन्य. इसमें जो विभीषण जैसे भक्त होते हैं उन्हें कुछ नहीं होता. इसी क्रम में दूत शुक का भी नाम आता है जिनके बारे में गोश्वामी श्री तुलसीदास जी ने अपने महाकव्य के सुन्दर कांड में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है- "जब तेहि कहा देंन वैदेहि, चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही. नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ, कृपासिंधु रघुनायक जहाँ. करी प्रनामु निज कथा सुनाई, राम कृपा आपनी गति पाई. रिषी अगस्त की साप भवानी, राछस भयऊ रहा मुनि ज्ञानी. बंदी राम पद बारहिं बारा, मुनि निज आश्रम कहुं पगु धारा." एक साधारण व्यक्ति और राजा के धर्म में सिर्फ इतना अंतर है कि जब कोई विपत्ति आती है तो साधारण मनुष्य अपने पिता, पुत्र माता और पत्नी की देखभाल करता है और राजा केवल प्रजा की. वही तो किया राम ने, जब माँ सीता पर विपत्ति आई तो अपना पति धर्म निभाया, और उन्हें मुक्त कराया तथा विपत्ति के कारण का समूल नाश किया. अगर आपके घर की इज्जत पर कोई हाथ डाले तो क्या आपका कर्तव्य नहीं है कि आप उस पापी को सजा दे? वही राम जब राजमुकुट पहन कर राजा बनते हैं तो प्रजावत्सलता बनी रहे इसीलिए अपनी उसी पत्नी का त्याग कर देते हैं जिसके लिए उन्होंने एक युद्ध किया था. "कोई भी राजा अपनी प्रजा के लिए पिता होता है अतः "बाढ़य पूत पिता के धर्मे, खेती उपजे अपने कर्मे." इसीलिए वहाँ के स्त्रीओ को विधवा होना पड़ा. राम ने या उनकी सेना ने उन्हें नहीं मारा जिन्होंने उनपर आक्रमण नहीं किया, और जो युद्ध की इच्छा से आये उसे मारने में कोई बुराई नहीं. यहाँ उन्होंने जो भी किया वो एक आदर्श मानव का कर्त्तव्य है. आपने एक प्रश्न छोड़ दिया, अगर राम का बालि के राज्यकाज में हताक्षेप अनुचित था, तो सुग्रीज का रावण (जिससे कि बालि की संधि भी थी) के राज्य पर आक्रमण उचित कैसे? महाराज बालि को भी मारना कोई अनीतिपूर्ण कार्य नहीं क्योंकि उन्हें सबसे पहले सुग्रीव के बारे में पता चला दोनों में एक दूसरे की आवश्यकता महसूस की दोनों एक दुसरे की सहायता के लिए वचन बद्ध हो गए फिर मित्रता हुई. अब एक मित्र का क्या कर्त्तव्य है उस पर गौर कीजिए- "जे न मित्र दुःख होंहि दुखारी, तिन्हहि बिलोकत पातक भारी." इसलिए मित्र्वत्सल भगवन राम ने कहा कि- "सखा सोंच त्यागाहूँ बल मोरे, सब विधि घटब काज मैं तोरे." बालि के दोष-दर्शन कर लिजिय- "अनुज बधू भगिनी सूत नारी, सुनु सठ कन्या सम ये चारी. इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई." अतः यहाँ भी राम ने वही किया जो एक आदर्श मित्र का कर्तव्य था.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आदरणीय पीताम्बर जी, सादर ! विश्वास और अविश्वास के झूले में झूलते आपके ये चन्द प्रश्न बड़े रोचक हैं ? आदरणीय, जब इतिहास लिखा जाता है, तो उसे थोड़ा-बहुत अतिरंजित किया जाता है ! आपकी आस्था, आपका विश्वास उसे मान भी सकता है, नकार भी सकता है ! राम ने राक्षसों का वध किया था, तो वे पापी क्यों नहीं हुए ? बंधुवर, किसी कार्य के औचित्य-अनौचित्य का विचार "इसीलिए" किया जाता है ? मुगलों का जब आक्रमण हुआ, और भारत के राजाओं से जो युद्ध हुआ, उसमें आप किसे दोषी मानेगे ? राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, रानी लक्ष्मी बाई आदि ने जो युद्ध किया, उसे आप किस कसौटी पर कसेंगे ! चीन से युद्ध, पाकिस्तान से युद्ध, अभी ताजा कारगिल युद्ध, ये सब आपके दृष्टिकोण में जायज हैं, या नाजायज ? कोई भी कार्य किसी के लिए हितकर हो सकता है, किसी के लिए अहितकर ! अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश भी किसी के लिए हितकर होते हैं, किसी के लिए अहितकर ! परिस्थिति विशेष का अंतर होता है ! इतना संकुचित दृष्टिकोण न रखें ! अपने विचारों को थोड़ा और विस्तृत करें ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

चातक जी, आपने बहुत मेहनत कर जवाब तो दिए पर आजकल ऐसा होना संभव नही लगता इसलिए इसे कपोल कल्पित ही समझने में बहस का अंत हो सकता है,वैसे आपकी सोच को कोई चैलेन्ज तो नहीं कर सकता! हिन्दुओं की भवनाओं की बात कर हमें मुसलमान न बनाएं,आपको विद्वान् मानते हुए भी प्रणाम करता हूँ पर आपकी सोच गल़त न हो कर भी अपने तक ही सीमित मानी जाएगी ,क्या सीता जी जैसी कोई स्त्री या आदमी अब तक नहीं हुआ है? जो आग में से निकल कर आ जाए? सोने की लंका को जलाने की बात कही गयी है न की पिघलाने की बात? ( सोना तो पघला हुआ भी कीमत नहीं खोता! ) फिर ऐसी ताकत वाले प्राणी को इतने भटकने की जरूरत ही क्या थी, वहीं से भी तो कर सकते थे यह सब! जैसे संजय सारथी को सब दिखाई देने का जिक्र है! आपने मेरे अल्प ज्ञान को पहचान लिया तो आपकी प्रशंसा करने में मुझे अच्छा ही लगता है ,आप जैसे विद्वान् से और भी सीखने को मिलेगा इसलिए निकटता बनाए रखियेगा धन्यवाद!

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

आदरणीय पीताम्बर जी, सादर अभिवादन, प्रथम दृष्टतयः तो यही लगता है मानों आपने बड़े ही अच्छे और गूढ़ सवाल पूछ लिए हैं परन्तु पुनः पढने पर आपकी पोस्ट पर ही उत्तर भी मिल गया और साथ ही आपकी एक बात बहुत अच्छी लगी कि आपने अपनी स्थिति भी छिपाने की कोशिश नहीं की है 'आप सचमुच अल्पज्ञ हैं'| सोने की लंका गोल्ड-ब्रिक्स से बनी रही होगी इस बात को कभी मैंने भी नहीं सोचा और पूरा विश्वास है कि किसी भी व्यक्ति ने नहीं सोचा होगा लेकिन आपने इतनी सॉलिड कल्पना कर ली तो इसमें हनुमान जी का और लंका का क्या दोष? ज्यादा सोना तो मैंने देखा नहीं है लेकिन थोड़े से सोने को भी जब ज्यादा दिखाना होता है तो उसमे लाख (एक अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ को भरते देखा है)| शायद आपकी पहली समस्या का समाधान हो गया होगा की हनुमान जी ने आग कैसे लगाईं| हठी बुद्धि अक्सर प्रश्न को क्षार होते देख पूरक प्रश्नों पर पहुँच जाते हैं तो उसका निदान भी करता चलूँ- हनुमान पवनपुत्र थे और अग्नी की लपटों को जब पवन का वेग मिल जाता है तो वह खुले वातावरण में भी स्वर्ण और लौह जैसे धातुओं को पिघलाने की ताकत के साथ प्रहार करती है गैस वेल्डिंग की मशीन तो आपने देखी ही होगी सारा कमाल वायु के दबाव का होता है? निश्चित रूप से ऐसा साधारण लोग नहीं कर सकते परन्तु पवनपुत्र के लिए ये ऐसा ही है जैसे हमारे लिए माचिस की तीली जलाना! दूसरा प्रश्न- माता सीता अग्नि से क्यों प्रभावित नहीं हुईं तो आपको बता दूं माता सत्य और विश्वास से अभिरक्षित थीं यानी असत्य उनके सम्पूर्ण देह और व्यक्तिव के किसी कोशिका में नहीं था ये बात हम जैसे लोग इसलिए नहीं समझना चाहते क्योंकि हमारी कोशिकाओं का निर्माण ही असत्य और संदेह के ईंधन से हुआ है| शायद अंग्रेजी में कही बात आपको समझ में आये- Truth is above harm. आपने माता का नाम शायद ठीक से पढ़ा नहीं उनका नाम सतवंती सीता है अर्थ तो समझ ही गए होंगे| तीसरे प्रश्न का उत्तर भी आपको दे सकता हूँ 'राम ने इतने लोगों का संहार क्यों किया? लेकिन छोड़ता हूँ क्योंकि ये प्रश्न सरलतम है और इसका उत्तर आप स्वयं दे और सिद्ध करे कि आपका उद्देश्य स्वस्थ बहस को जन्म देना है न कि हिन्दूओं की भावनाओं से खिलवाड़ करना| और यदि आप इस प्रश्न का उत्तर न दे पाए तो मुझे भी स्वीकार करना होगा कि आप हिन्दू-आस्था को सॉफ्ट टार्गेट मानकर प्रहार करने वाले लोगों में से एक है, आपको ईश्वर सदबुद्धि प्रदान करे|

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय थक्वानी जी, भारतीय राजनीति ने ऐसी परिस्थितियाँ बुन डाली हैं कि "बलात्कारी" का जो अर्थ आप ने प्रतिपादित किया है, उसे समस्त हिन्दी कोशों को तत्काल ग्रहण कर लेना चाहिए-- "लेकिन हिन्दी भाषा में इस ‘विस्तृत’ अर्थ का अर्थ ‘संकुचन’ होकर अब केवल एक ही अर्थ में माना जाने लगा है! जिसका आजकल नेताओं द्वारा किया जाने वाला काम होने लगा है! हम कह सकते है की बलात्कारी मायने ‘नेता’ या नेता मायने बलात्कारी! (नेताओं के सन्दर्भ में बलात्कारी का मतलब है किसी मजबूर, जरूरतमंद, लड़की, औरत या महिला के शरीर से खेलना, उसकी अस्मत से खेलना!, उसकी सहमति से!) यदि नेता ने ऐसा नहीं किया है , तो वह नेता ही नहीं है?" साथ ही राजनेताओं के इस कुकर्म पर करारा व्यंग्य कर सामाजिक उपकार किया है; हार्दिक साधुवाद !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

सिंह साब आप जैसे व्यक्ति अल्पज्ञानी ?,तो फिर हम तो कहीं भी ठहर ही नहीसकेंगे? धर्माधिकारी तो कहेंगे सो कहें ,पर अब समय बदल गया है हर आदमी तर्क की कसौटी लिए घूमा रहा है ,आज एक पोस्ट आयी है जिसमे ब्लोगेर ने राम और उनके भक्त हनुमान को उनके कारनामो के कारण अपूजनीय करार दिया है? क्योंकि हनुमान ने लंका को जलाकर नुकसान किया था जो अमानवीय ही कहा जाएगा! अब बताईये कभी पहले ऐसा सुना था? जन कल्याण तो व्यक्तिनिष्ठ है अपनी-अपनी सोच है! मैंने अपने विचार रखे हैं आपने अपने, इसमे न तो कोई संकोच होना चाहीये न ही कोई अल्प ज्ञान! बर्तन को जितना मंजाई करेंगे उतना ही उसमे चमक आयेगी! आप निडर हो कर लिखते रहें, बस प्यार बना रहे!

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम अजीब सी कसमकस है ,..हमारा समाज तमाम बुराईयों का खजाना बनता जा रहा है,....नैतिक शिक्षा का अभाव और पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण समाज को खाए जा रहा है ,...कम उम्र में विवाह से मसला नहीं हल होगा ,.खांप पंचायते भी यह समझती होंगी ,...कम उम्र में विवाह एक लिहाज से उचित भी था ,.. कमउम्र के दम्पति के बीच सम्बन्ध नहीं होता था ,..पूर्ण विदाई की रस्म विवाह के सात आठ वर्ष बाद होती थी जब दोनों परिपक्व हो जाते थे,..आपके कथन से सहमत हूँ ,.अब उस स्थिति में नहीं जा सकते हैं ,..योग आध्यात्म और सही शिक्षा से ही बचाव संभव लगता है ,....अंत में हर पाप का बदला नियति अवश्य लेती है ,.नहीं संभले तो इसका दुष्परिणाम भी मिलेगा ,....सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

समीर जी, आपकी पोस्ट मैंने पढी है पर मैंने खुद ही जब जवाब लिखकर भेजा होता, तो आपकी पोस्ट पर अनुकूल टिप्पणी करना अपने मुंह मिट्ठू बनना जैसा लगता! आपकी पोस्ट मुझे और भी ज्यादा अच्छी लगी , व्यवस्थित होने के कारण आपकी पोस्ट ज्यादा वजनदार लगी! मेरा टैग है 'सपाटबयानी' इसलिए मैं तो ऐसे ही लिखता और कहता हूँ ! अपने इस स्वभाव के कारण मैंने नुकसान भी उठाया है पर यदि मैं सही हूँ तो यह सब कोई मायने नहीं रखता! या फिर मैं लिखना और बोलना या कहना ही छोड़ दूं? फिर तो दीवार पर टंगी तस्वीर और मुझ में क्या अंतर रह जाएगा? वह तस्वीर जो न हिल-ढुल सकती है, बोलना तो उस तस्वीर के लिए दूर-दूर तक संभव ही नहीं! जायसवाल के किये हर ब्लॉग वालों का यही नजरिया है, आप चिंता करें ही नहीं !

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

नमस्कार पीताम्बर जी, "यहाँ किसी चीज की कमी है ही नहीं,कमी है तो केवल चरित्र की!" यह बिलकुल ठीक कहा आपने. ...शायद इस कमी के कारण हम सभी एक-दूसरे के अधिकार पर अधिक्रमण और अतिक्रमण कर रहे हैं. दिन-रात इसी आपाधापी में लगे रहने के कारण लोग बिना किसी ठोस कारण के परेशान हैं और स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं, तो हल के रूप में बस संग्रह में ही लगे हैं, देने की वृत्ति का तो अभाव हो गया है. बड़े और समर्थ यानी बाहुबली लोगों में यह एक असाध्य रोग हो गया है. फलतः सही मायने में गरीब व्यक्ति तो और अधिक गरीब व बेबस हो रहा है. अनुचित एवं अनावश्यक संग्रह से (उदाहरण- दो-तीन प्लाट या मकान खरीदने से) चीजों की व्यर्थ में कमी हो रही है, जिससे दाम बेतहाशा बढ़ने से कुछ जरूरी चीजें आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही हैं. इस प्रकार व्यर्थ की भेड़चाल व आपाधापी जारी है और सब कुछ होते हुए भी यह देश अभावग्रस्त लग रहा है.

के द्वारा: सचेतक सचेतक

आदरणीय पीताम्बर जी, काफी हद तक सत्य को उजागर करता हुआ लेख है आपका, भारत बिलकुल भी गरीब देश नहीं है, किन्तु इस देश के देशवासियों और यहाँ के नीति निर्माताओं की कमियों की वजह से आज भी इस देश की आधी से ज्यादा जनता गरीब ही है, आज भी भारत के आधे से ज्यादा परिवारों में एक व्यक्ति के एक समय खाने का मूल्य 15 रूपये से कम है, तथा उनके लिए दो वक़्त के खाने का इंतजाम करना ही बहुत बड़ी बात हो जाती है! ज़्यादातर ग्रामीण इलाको के बच्चे आज भी कुपोषण के शिकार हैं! मैं मानता हूँ की विविधता तो लगभग सभी देशों में देखने को मिलती है, किन्तु भारत तो हमेशा से ही विविधता के मामले में नो. १ पर रहा है! आज भी ज़्यादातर जनसँख्या इसी विविधता के चलते गरीब है और चन्द व्यापारी और नेतागण करोडपति-अरबपति हैं!

के द्वारा: Anil "Pandit Sameer Khan" Anil "Pandit Sameer Khan"

श्रद्धेय पीताम्बर जी, आप का अनुमान सही है | कल शाम "हिन्दी शिक्षण" से आकृष्ट होकर मैंने आप की पोस्ट खोल ली | पढ़ने लगा तो तथ्य कुछ और ही था | फिर तत्काल टिप्पणी शुरू की, पर टिप्पणी इतनी बड़ी होती गई कि बड़ी टिप्पणी देना मुझे अटपटा लगने लगा | फिर उसे कॉपी करके वर्ड पर ले गया, तो वह एक छोटी पोस्ट का आकार ले चुकी थी | मेरी टिप्पणी का मुख्य विन्दु आप के इस विचार का स्पष्टीकरण था-- "आरक्षित वर्ग के लोग हर जगह फ़ायदा तो चाहते है पर अपने को, अब वे अपना वर्ग बताने को भी हिचकते है, अरे भाई जब तक बताओगे नहीं तो लोग जानेगे कैसे कि आपके संग क्या न्याय /अन्याय हुआ था? आप अपनी सरनेम में तो बाल्मीकी, मौर्य, आर्या, सूर्या और ऋषियों के नाम लिखकर उनकी संतान बताते हो, पर ‘बालमीकि’ सरनेम से पुकारे जाने पर आपत्ति करते हो? जब कि सरकारी रिकार्ड में आपने खुद ही लिखा है ! यदि ऐसा है तो आप नाम में इस शब्द को क्यूं जोड़ते हो ?” श्रद्धेयवर, दर असल इस वर्ग की विडम्बना उस “छेदीराम”-जैसी है, जो “छेदिया” के पुकारू-तुकारू से तंग आकर जब अपना गाँव-गिराँव छोड़कर बाहर निकला, तो कहीं “सुराख अली”, कहीं “मिस्टर होल” बना, पर तौहीन का आलम न बदला तो न बदला | किन्तु आप मेरे श्रद्धेय हैं, यदि मेरे विचारों से आप को तनिक भी ठेस पहुँची हो, तो क्षमा-प्रार्थी हूँ | जहाँ तक वर्गीय अपमान की बात है, तो बचपन से इतना कुछ पाया है कि खाल काफी मोटी हो चुकी है, इसलिए अब ज्यादा फर्क नहीं पड़ता | हाँ, शिक्षा से जुबांन मिल गई है और गाहे-बगाहे तल्खी पर प्रतिक्रिया का अपराध हो जाता है |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

माननीय अजय जी, आपने मेरी पोस्ट को देखकर मुझे ही सम्मान दिया इसका आभास करते हुए कहता हूँ की आपकी सभी बातें सही है फिर भी - १- क्या कोई अपने लाभ के बिना कुछ करता है?  २- हमारे यहाँ भी कोई दुकानदार तभी अपने कर्मचारी को ५००/- देगा,जब उसे १०००/- का लाभ होगा उससे! ३- क्या इस वालमार्ट से हमारे लोगों को जॉब मिलता है तो क्या कम है? ४-एक पक्षीय बात तो यह है की उन्हें हमारी जरूरत नहीं है और हमें उनकी जरूरत है तो यह सहना ही पडेगा हमें! ५-हो सकता है की इसके बाद उन्हें हमारी जरूरत पड़े और वे वीसा शर्तों में कोई ढील दे! हमारी जरूरते है तो मौनी बाबा को दिलेरी दिखानी होगी ही! फिर इस समय तो ममता के बिना भी सरकार सब कुछ कर सकने को सक्षम है तो चलेगी तो मौनी बाबा की ही! जनता द्वारा मिलावट,जमाखोरी,मुनाफ़ाखोरी,कमतोली तो रोकी नहीं जा सकती है यह काम तभी होगा जब प्रितिस्पर्धा में कोई आयेगा!

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

पीताम्बर जी, नमस्कार,  आपके विचार बहुत संतुलित हैं और निष्पक्ष हैं। किन्तु कुछ बातें सोचने को विवश करती हैं जैसे (1)- कोई भी अपनी पूँजी व्यवसाय मे लाभ के प्रयोजन से ही लगाता है,विदेशी निवेश से अर्जित लाभ विदेश मे ही जायेगा।भारतीय कर्मचारियों को वेतन भारतीयों से ही वसूल करके दिया जायेगा और अर्जित  लाभ विदेश भेजा जायेगा। (2) विदेशी निवेश गलत नहीं है किन्तु यह एक पक्षीय नहीं होना चाहिये। एक ओर तो अमेरिका अपने यहां के काम भारत मे भेजने (आउट सोर्सिंग) पर प्रतिबंध लगा रहा है,भारतीयों को काम करने वाले वीजा के नियम कड़े कर रहा है और हमारे मौनी बाबा अपने दरवाजे खोल कर दिलेरी दिखा रहे हैं।     F.D.I. से लाभ भी हैं।विरोध करने वाले हमारे व्यवसायी बन्धुओं ने कभी मिलावटखोरी,जमाखोरी, घटतौली, गलत तरीके से मुनाफाखोरी आदि पर नियंत्रण नहीं किया है। यदि यही स्थिती रही तो जनता स्वयं F.D.I. को निमंत्रण देगी।

के द्वारा: ajaykumarsingh ajaykumarsingh

आदरणीय पीताम्बर जी, वाकई इल्म तो खजाना होता है, जिसे कोई लूट नहीं सकता. आपके बेटे भी इस इल्म से महरूम नहीं हैं, डॉक्टर भी अपने से जूनियर डॉक्टर और नर्सों को इल्म बांटता है कम्पूटर इंजिनीअर भी अपने से जूनियर को सिखाता रहता है देखा जाए तो दुनिया एक पाठशाला है और हर आदमी अलग-अलग इल्म का शिक्षक है, वह अक्सर ही दुसरे व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखाता रहता है! साथ ही सभी व्यक्ति औपचारिक शिक्षक नहीं बन सकते हमें हर क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की ज़रुरत है, बाकी पिता बच्चों का भला ही चाहते हैं और बच्चे भी जहां तक हो सके अपने माँ-बाप का भला चाहते हैं और उनके नाम को और ऊँचा करना ही चाहते हैं! अफ़सोस की तो कोई बात ही नहीं, आपके बच्चे समाज की तरक्की में अपनी-अपनी जगह रहकर भी बहुत अच्छी भूमिका निभा रहे हैं! डॉक्टर और कम्पूटर इंजिनीअर बनना भी सबके बस की बात नहीं! सबकी अपनी अपनी योग्यता और रूचि है!

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अग्रवाल साब , प्रणाम स्वीकार करें!आपकी बात तो हमेशा ही अकाट्य रहती हैं,पर यह भी जानते हुए की अमेरीका तक में वालमार्ट विरोध हो रहा है,फिर भी हम और हमारे व्यापारी तथा लेखक व पाठकों में अधिकाँश इस व्यवस्था को गलत न मान कर मुझे लिखकर, मेरे विचारों से सहमति जता रहे हैं,यह सही है की बड़ी मच्छली छोटी को खा जाती है पर अपने देश में भी तो बड़े और बड़े,उनसे भी बड़े व्यापारी हैं वहां भी यह सिद्धांत लागू क्यों नहीं होता? हमारी सोच इन नेताओं से अलग है वे हमारी सोच के अलावा और भी कुछ सोचते होंगे जो हमें नहीं मालूम , और भी कई कारण हो सकते हैं? आप किसी की नादानी पर तरस न खाएं,आने दे सब के विचार फिर सम्पूर्ण तसवीर साफ़ हो सकेगी.

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

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पीताम्बर जी नमस्कार ,आप ने बिल्कुल सत्य लिखा है ,ये नेता ही है , जों ना कुछ देता ,बस लेता चाहे वो किसी रूप मे क्यो ना ले , पब्लिक तो असहाय है और क्या करे कोलू का वैल बन कर रह गयी है , आलेख को पढ़कर मन बहुत प्रसन्न हुआ ,,,,,आन्दोलन या बंद कब तक अब तो केबल निर्णायक जंग हो आर या पार ,,,, श्रीमान जी अनुराग शर्मा है ना की मिश्रा ,दोनों ब्लॉग मेरे ही है।,,, धन्यबाद सहित आपका डॉ हिमांशु शर्मा (आगोश ) ,,,,,,,                                 किसी के कहने पर चल देते है भीड़ का अंग बनने, क्योंकि हमारे पास परिचित ,नेता आकर मनाते हैं साथ चलने को, हम सोचते है पता नहीं कब इनसे काम पड़ जाए, सो मन मार कर चल देते है इनके संग भीड़ का एक अंग बन कर!

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

साहब ठिक है छोटे अक्षर देखने में परेशानी है लेकिन काले में तो परेशानी नही । आप से पहले काफी लोगों को मै ये बात कह चुका हुं । सब ने मेरे बात का मान रखा है और सादा अक्षर में लिखने लगे हैं । आप ही विचलीत हो गये । . ये आप के शब्द है . -------महसूस करने लगा हूँ की कई लोग या अधिकाँश इन ब्लोग्स पर मात्र औपचारिकतावश ही दो शब्द लिख कर खुश कर देते हैं और वे चाहते है की हम भी उनके बदले में ऐसी ही राय लिख कर कमेंट्स की संख्या में इजाफा कर दें! पर यह ठीक नहीं लगता?,आप भरपूर ही आलोचना कर सकते हैं, उससे हम अपनी लेखनी को और ठीक कर,आप से सीख सकेंगे! हाँ इसमे यह जरूरी हो जाता है की आप पूरा का पूरा ब्लॉग पढ़ें !-------- . ये मेरे शब्द है । . -----ग्लास को बीचमे से काट दो तो निचे का हिस्सा एक छोटासा बरतन बनता है । उसे वाटकी कहा जाता है । पडोसी औरतें वटकी ले कर एक दुसरे के घरमें चली जाती है, चाय का पाउडर, चीनी, आटा जीस की भी जरूरत पडे ले आती है, दे आती है । ईसे ” वाटकी व्यवहार ” कहा जाता है । जे.जे. में भी ये है, आप की बात सही है ।------ . ये बात न मुज पर लागू होती है ना आप पर, जनरल भात थी, और हम लोगोने एक ही बात कही है, समज में नही आया हो तो पढो दुसरी बार । फीर भी ईस बात पर आप को खराब लगा । . और कहानी में, आपने कैसे मान लिया की मैने आपकी कहानी को काटा है ? हम यहां क्या करते हैं ? बातें । बातों बातों मे आपने पंचतंत्र की कहानी कह दी मैने स्कूलवाली कहानी कह दी । ये ऍडिशन था । आपने उसे भी गलत ले लिया । और मुजे कहते हो मैने अन्यथा ले लिया, दुख हुआ है । आप के लेख में एक तो चीज बताओ जीसे मुझे अन्यथा लेना पडे, दुखी होना पडे । आपने कोइ बडी बात भी नही कही है, विषय ब्लोगर के बिहेवियर का था । . आप को कोमेंट ही समजमे नही आता है तो अब से अलविदा ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

पहले तो सहब काले और स्टांडर्ड अक्षरों में लिखिए जीस से पढने में परेशानी ना हो । बडे अक्षर से लेख बडा नही बनता, रंगीन अक्षर से शोभा नही बनती । किमत आप के शब्दों की है । ग्लास को बीचमे से काट दो तो निचे का हिस्सा एक छोटासा बरतन बनता है । उसे वाटकी कहा जाता है । पडोसी औरतें वटकी ले कर एक दुसरे के घरमें चली जाती है, चाय का पाउडर, चीनी, आटा जीस की भी जरूरत पडे ले आती है, दे आती है । ईसे " वाटकी व्यवहार " कहा जाता है । जे.जे. में भी ये है, आप की बात सही है । लेकिन हमारे जैसे लोग अलग सोचते हैं । बात समज आई तो कोमेंट देते हैं नही आई तो नही देते । जैसे की आपकी बात मुजे समजमें आती है तो कोनेंट करता रहता हुं, मेरी बात आपको समजमें नही आती तो आप कोमेंट नही करते । और यही होना चाहिये । लेकिन एक बात और भी है । जाने अन्जानेमें वाटकी व्यवहार बन ही जाता है कम से कम मित्रों के लेख पढ लेते हैं, दुसरे का नही पढा तो चलता है । ईस लिये भी कोमेंट चला जाता है मित्रों के खातेमें । उंट की तो ये कहानी है------उंट एक बार बन ठन के निकला । कुत्ता मिला तो उसे कह दिया देख तेरी पूंछ टेढी है । बाध को कहा तेरे नाखून टेढे हैं । बैल को कहा तेरे शिंग टेढे । सब जानवर के एक एक अंग टेढे बता दिये । शियार से रहा नही गया । कहा सब का तो एक एक टेढा आप का तो अठराह ( १८ ) टेढे ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अनिल कुमार समीर पंडित खान साब ,आपको धन्यवाद प्रतिकिर्या के लीये! आपका जितना नाम लंबा है उतनी सोच भी दूर तक जाती है,आपने यह सही कहा है की दूसरों के आगे कहने में कोई संकोच नहीं होता पर अपनों के सामने कहने में संकोच होता है, की कैसे और कहाँ से शूरू करें,सो अनिल जी इसमे कोई संकोच करने की जहमत न लें! जहां से चाहें शुरू कर सकते हैं ,बस बात पते की हो! आपने मुझे किस मन से अपना कहा और जाना, नहीं मालूम? अब मैं मुद्दे पर आता हूँ,एक वस्तु स्थिति और एक आदर्श स्थिति होती है,मैंने जो है उसे बताया है जब की आपने क्या होना है उसे! आपने लड़कों का दोष भी बताया है तो मैंने उन्हें निर्दोष कहाँ बताया है? आप मेरी साईट पर मेरी पोस्ट जरूर देखें - ' मर्द बड़े कमीने होते हैं " जिसमे मैंने मर्दों का ही दोश बताया है! अंत में आपकी जानकारी के लिए यह बताना चाहूंगा की आजकल लडके भी अपनी पत्नियों को घर के काम में मदद करते है जिसमे खाना बनाना, सफाई,बर्तन, बच्चों को नहलवाना भी है, करते है !पर मैं तो कहूंगा इन लड़कियों से जयादा जानते और करते हैं.

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

आदरणीय पीताम्बर जी, कहाँ से शुरू करूँ कुछ समझ नहीं पा रहा, शायद इसलिए क्योंकि हम गैरों का विरोध बहुत आसानी से कर सकते हैं, किन्तु जब कोई अपना ही आपके सामने हो तो हम अपने आप को ऐसे असहज और कमज़ोर महसूस करने लगते हैं, जैसे की बाली के सामने आने वाले व्यक्ति की आधी शक्ति चली जाती है!.....फिर भी आधी-अधूरी शक्ति के साथ उसी परम्परा को निभाते हुए जो सत्यता और समानता का समर्थन करती है...... प्राचीन काल से ही नारी को एक उपभोग की वस्तु से अधिक कभी नहीं समझा गया तथा धर्म, संस्कृति, मर्यादा इत्यादि के नाम पर नारी को त्याग करने और बंदिशों में बाँधने का चलन भारतीय समाज की पहचान है, कुछ लोग इसे मनगढ़ंत पूर्वाभासो के आधार पर सही ठहराने की कोशिशे करते भी देखे जाते हैं....किन्तु कोई भी ऐसा कारण जो किसी वर्ग विशेष को, बिना उसके द्वारा की गयी किसी गलती के आधार पर किसी बंदिश में बाँधने की वकालत करता है सरासर गलत है तथा पुरुष वर्ग स्त्रियों पर बंदिशे लगाने की वकालत ऐसे आधारों पर करता चला आ रहा है, जिसका दोषी पुरुष ही रहा है, जैसे स्त्री की इज्ज़त पर घर के बाहर हमला हो सकता है....करने वाला तो कोई पुरुष ही होगा, साथ ही एक सत्य यह भी है की स्त्री की इज्ज़त पर हमला करने वालों में आधे से ज्यादा घटनाएं किसी चिर-परिचित द्वारा ही की जाती हैं! घर के बाहर पुरुष भी निकलते हैं, लेकिन ऐसा शायद ही कभी हुआ हो की स्त्रियों के किसी झुण्ड ने किसी पुरुष के कपडे फाड़ दिए हों (जैसा की गुवाहाटी में पुरुष झुण्ड द्वारा स्त्री पर किया गया)! प्राकृतिक रूप से स्त्री और पुरुष में शारीरिक बनावट में भिन्नता होती है, लेकिन आगे का समस्त व्यवहार सुनियोजित तरीके से घर के अन्दर और उसके पश्चात समाज द्वारा गढ़ा गया होता है, स्त्री को आप समस्त अच्छी चीज़े सिखायेंगे, घर के काम-काज सिखायेंगे, घर के बाहर कम से कम जाने देंगे और जहाँ तक हो सकेगा किसी के साथ ही भेजेंगे, मैं ये नहीं कहता की यह गलत है किन्तु यह अन्यायपूर्ण भेद-भाव है, हमें अपने लड़के एवं लड़की दोनों को घर की साफ़-सफाई रखना, घर के कामों में हाँथ बटाना, बड़ों की आज्ञा लेकर घर के बाहर जाना और जहाँ तक हो सके किसी बड़े के साथ ही बाहर जाने इत्यादि की शिक्षा देनी चाहिए, साथ ही सबसे ज्यादा ज़रुरत आज के युग में चारित्रिक शिक्षा की है, जो की टेलीविजन द्वारा पूरी तरह से नष्ट कर दी गयी है तथा माता-पिता भी बच्चों को बिना उचित रोक-टोक के ज़्यादातर कार्यक्रम देखते रहने देते है, उसमे भी अधिक छूट लडको को, क्यों ? आपका बच्चा क्या गलत चीज़े नहीं सीख रहा, क्या कल वह नासमझी में घर में या बाहर कोई अनैतिक व्यवहार नहीं कर सकता? करता ही है....घर वालों की नजरो से बचाकर, कभी स्कूल में, कभी सड़क पर, कभी पार्कों में, सारी अव्यवस्था तो पुरुष वर्ग ही फैला रहा है किन्तु बंदिशे नारी पर, यह कैसे जायज है? आप अपने लडको को उचित आचरण की शिक्षा नहीं दे पा रहे, सेंसर बोर्ड टेलीविजन और फिल्मों की उचित काट-छांट नहीं कर रहा, सरकार स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही.....देखा जाए तो सारी गलती उस ज़िम्मेदार वर्ग की है, जो अपनी कमियों पर नज़र डालना ही नहीं चाहता, जो अपने कर्त्तव्य निभाना ही नहीं चाहता, बस बहाने बनाना जानता है ! स्त्री को सदा से कमज़ोर बना के रखा गया है तथा आगे भी यही चाहता है पुरुष वर्ग....एक कहानी याद आ गयी "अंधेर नगरी चौपट राजा" किसी अन्य के जुर्म की सजा, किसी और को देना जायज़ ठहराया जाता है यहाँ..... स्त्री सम्मान के सन्दर्भ में लज्जा फिल्म अद्वितीय है...उम्मीद है आपने ज़रूर देखी होगी!

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अनिल उर्फ़ समीर पंडित जी, आपके नाम को अब भूलना सरल नहीं होगा! आपने अपनी पोस्ट पर टिप्पणी चाही है मैंने इस पोस्ट को आद्योपांत देखा, और पाठकों के विचार भी .हर पाठक ने अपने-अपनी सोच से कहा है, ठीक भी है,मैंने जाना की आपके दिल में भी औरों की तरह आग लगी हुई है, पर करें क्या?सरकार का उद्देश्य जो है वह सब जानते हैं उसका फ़ायदा उन्हें मिल रहा है तो क्यों नहीं लेंगे? हम आप होते तो हम आप भी क्या ऐसा नहीं करते? आप का इस विषय पर गहन अध्यन यह बताता है की हम सब मन को मार ही बैठें और कोइ उपाय तो है ही नहीं या फिर इन लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर बैठें , जो नहीं हो सकता! समय की मांग हमें कितना और सताती है, देखने के सिवाय और कोई चारा है नहीं!

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मै युरोप परस्त दोगलों का दोगलापन बताता हुं । ४०-५० साल पहले भारत का आदमी कान मे कडी या कोइ छोटा गहना पहनता था । गांधीजी के कान में होल भी गिराए गये थे गहना पहनने के लिए । पिछडा पिछडा बोल के गेहने की आदत छुडा दी । आज वाया युरोप वापस चालु हो गया । चर्च चालित कोन्वेंट सस्कूल में लडकी कपाल में बिंदी या हाथ में मेहंदी लगा के जाती है तो स्कूल से बाहर किया जाता है । औरतें हाथों में छोटे छोटे काले टेटु लगाती थी तो उसे पिछडी कहा जाता था । औरतों ने वो छोड दिया । वहां की औरतें देखो । पूरा शरीर टेटू से भर देती है । और गेहने कहां कहां पहनती है ? जीभ पर, स्तन पर, अपने जननांग पर । जाहिल तो वो है अब । ईतने पिछड गए हैं की जानवर हो गए हैं । भैंसे की तरह ही औरत का जननांग भी चाट लेते है । भारत के दोगले क्या यही लाना चाहते है ?

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय पीताम्बर सर, प्रभावशाली लेखन से परिचय करने के लिए के लिए आभार मेरे पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया मैं भी मैंने यही जबाब दिया है की ये मेरी व्यक्तिगत सोच है, मेरे व्यक्तिगत विचार| आप मेरे बुजुर्ग है अत: आपके मार्गदर्शन रुपी प्रतिक्रिया को अन्यथा लेने का दुस्साहस निर्भय होने के बाबजूद मैं नहीं कर सकता... आपकी बात से सहमत हूँ..शायद मैं अपनी बात बेबाकी से रखने के बाबजूद उसका अर्थ समझा न सका .. मैंने स्पस्ट किया है की " यह क्रीम एक टूल है टूल की ही भांति प्रयुक्त की जानी चाहिए" दूसरी और मैंने कहा है की हमारे समाज मैं कंडोम तथा पुरुषों के लिए उत्तजना बढाने वाली दवाएं वर्षों से बाज़ार मैं खुले आम बिक रही हैं| इन पर कभी कोई मुखर या गंभीर नहीं हुआ...रोक तो इन पर भी होनी चाहिए... अंत मैं आपको प्रणाम करते हुए मैं अपनी सोच पर कायम हूँ...अगर आप इसे ध्रष्टता समझे तो बालक होने के नाते क्षमा प्रार्थी हूँ...

के द्वारा: Himanshu Nirbhay Himanshu Nirbhay

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

के द्वारा: satish3840 satish3840

आदरणीय थकवानी जी कहा तो तो आपने सही है की राम देव बाबा का कथन की विदेशो से काला धन जब वापस आएगा तो इस देश के प्रत्येक व्यक्ति को कितने ही वर्षो कोई टैक्स नहीं देता पड़ेगा सब देश वासियों को दोदो लाख रूपये अलग से मिल जायेंगे पर बाबा ने आज तक यह नहीं बताया की उनके पास विदेशो में जमा धन का आंकड़ा जो उनके अनुसार चार लाख हजार करोड़ रूपये होता है कहाँ से मिला और क्या उनके अर्थ शास्त्र के अनुसार यह पैसा काला ही और आने के बाद जनता में ही बांटा जायगा अगर ऐसा है तो फिर गडकरी जी द्वारा उनके पैर छूने या चरण वंदना में कोई हर्ज नहीं क्योंकि वह एक बहुत सभ्य और बड़ी राजनैतिक पार्टी के हेड हैं और उनके किसी कृत्या या कुकृत्य से जनता का भला होता है तो अच्छा ही है ? धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

પિતાંબરભાઈ चाईना के एक गांव का समाचार पढा । २००० हजार की बस्ति है । वो लोग दुनिया के सब से धनी है । वहां टेक्षी भी है और हेलिकोप्टर भी है जीस का टेक्षी की तरह उपयोग होता है । वहां कानून कडा है, रोड पर कोइ थुक भी नही सकता । पकडा गया तो पूरा दंड मिलेगा, १००-२०० दे के आदमीं छटक नही सकता । १९९० में एक दोस्तका भाई वहां के चलन का चिल्लर लाया था । थोड मुझे भी दिया था । एल्युमिनियम का, हमारे पांच पसे जैसा था । उसने बताया ईस की किमत हमारे तिन पैसे जीतनी है और आदमी होटल मे जा के आराम से पेट भर खाना खा लेता है । हां, तब पगार भी बहुत कम थी । लेकिन उस समय भी लोग सुखी ही थे । आज २१ साल के बाद मेहंगाई ज्यादा से ज्यादा कितनी हो बढी होगी । वहां की सरकार तानाशाह सही लेकिन देश प्रेमी है, प्रजा प्रेमी है । यह स्थिति सब तरिके की राज्य व्यवस्था से कहीं ज्यादा अच्छी है । लोकशाही मे चोर सरकार जनता को जनता के ही धन से खरिदती है, आपने देखा होगा मोबाई और २०० का टोकटाईम लगाया है एक आदमी की किमत । जहां बिकाउ जनता बसती हो उस देशमें आप क्या आशा कर सकते हो ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

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के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan




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