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सपाटबयानी

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सम्पादकीय सोच का सच ?

पोस्टेड ओन: 15 Oct, 2012 जनरल डब्बा में

यह बहुत पहले से ही माना जाता रहा है कि “नेता कुछ नहीं देता,, पर हर बार है लेता ” हमारे नेता हर बार ऐसा बयान दे जाते हैं जिसके कारण उन्हें हम क्या, कोई भी अक्लमंद नहीं कह सकता चाहे अक्लबंद जरूर कहें! पर हमें तब और अफसोस होता है ज़ब ये समपादक इन नेताओं की बेतुकी बातों को अपने समाचारों की सुर्खियाँ बना कर उनका महत्व मान बढाते रहते हैं? आजकल नंबर वन कहे जाने वाले ” दैनिक जागरण ” के सम्पादक भी उनसे अलग नहीं कहे जा सकते? इसलिए उनकी सोच पर भी हम सवालिया निशाँ लगाने को विवश हैं!और
‘जागरण फोरम’ में लगातार दो विषयों पर जायसवाल जी,और पूर्व सी एम् चौटाला जी, के बारे में क्रमशः ‘नई बीवी…… ‘ और ‘खाप के विचारों………. ‘ से सम्बंधित विषय पर लिखकर सवालों के जवाब मांगे जारहे हैं, वे क्या किसी भी तरह उनकी ख्याति को बढ़ा नहीं रहे हैं? जब की नेताओं के इन बयानों पर न लिख कर सम्पादक महोदय को उन्हें ‘इगनोर’ ही करना उपयुक्त है! हम सब जानते है की ये अनपढ़ हैं और कुछ भी बोलने के आदि हैं इन्हें समय ही कहा रहता है की सोचें? सो कह देते हैं कुछ भी! ये नहीं जानते के उनके वक्तव्य के और भी अर्थ निकल सकते हैं और महिलाओं, जन सामान्य की भावनाओं को ठेस भी पहुँच सकती है ? पर हमें तो ‘सम्पादक दैनिक जागरन की सोच पर अफ़सोस होता है की वे क्यों इनकी बेहूदा बातों को वजन देतें है? अरे, इससे तो हमारे ब्लॉगर्स ही काम की और सही बातें कर गुजरते हैं ,पर सम्पादक को ये ब्लोगर्स क्या फ़ायदा दे सकते हैं ? यही लोभ वाली प्रवृति ही यहाँ काम कर जाती है! शायद लोभ होता है की इनका नाम ला कर,उन्हें पारश्रमिक दे कर उनसे अपने समाचार पत्रों के लिए लाखो और कडोरों के विज्ञापन हासिल करेंगे! यही सम्पादकीय सोच का सच है!

इसी तरह टी वी चैनल्स पर रवीश जी भी छाये हुए है आजकल! तमाम नेताओं को बहस के लिए बुलाना क्या दार्शाता है? वे कैसे लड़ते हैं की कोई किसी की न तो समझ में आता है ना ही श्रोता और दर्शक ही समझ पाते है,और रविश जी जरूर अपनी प्रितिभा का लोहा मनवा लेने में सफल हो जाते हैं! फिर इनको एक बड़ी रकम भी दे कर उनसे लाभ लिए बिना नहीं रहते होंगे ? तो यही है सम्पादक महोदय की सोच का सच ! अंत में हम चाहेंगे की हल्केपन से दिए गए इन नेताओं की बातों को वजन न दें, और जिससे की इनकी और ख्याति बढ़ सके ! हम जानते है की आप इन्हें नंगा करने की बात कह सकते है ,पर जो पहले से ही नंगा हो उसे और क्या नंगा किया जा सकता है?

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 15, 2012

परम श्रद्धेय वर , सादर नमन !…….शत प्रतिशत मैं आप के विचारों से सहमत हैं , मुझे to सब घालमेल लगता है ! अफसोस भी होता है और ब्रीडा भी , इनकी समझ पर !! पुनश्च !

    pitamberthakwani के द्वारा
    October 15, 2012

    आचार्य जी, आप तो विद्वान् ही हैं ,अब मीडीया वाले भी भरोसा खोते जा रहे है ! सब पैसे के पीछे दौड़ रहे हैं इसलिए मैंने एक पोस्ट लिखी है की ‘प्रजातंत्र का चौथा खम्भा गिरनेवाला’ है! उसे जरूर पढ़ें! आभार के साथ! आप सदैव ही गुंजन करते रहें!




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