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'विलेन' से 'नायक' और 'विदूषक' तक!!

Posted On: 19 Nov, 2012 Others में

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ऐसा माना और जाना जाता रहा है की हंसना जीवन में बहुत जरूरी है और बहुत ही पुराने जमाने से जीवन में फिट रहने के लिए और हंसाने के लिए फिल्मों में एक विशेष पात्रों को रखा जाता था जो हंसाने का ही काम करते थे ! यह बात जीवन में फिट रहने के लिए जरूर मानी जाती रही है!
फिल्मी दुनिया के इतिहास इस बात का गवाह है की एक जमाने में फिल्मों में हंसने और हंसाने के लिए एक विशिष्ठ भूमिका वाले कलाकारों का महत्त्व हुआ करता था! और ये कलाकार बहुत ही महत्व रखने के कारण भी अपनी भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे! इसलिए इनके नामों से भी फिल्में चला करती थीं! इनका कार्य फिल्मों के नायको से किसी भी प्रकार कम नहीं आंका जाता था! इनमें उस जमाने के शेख,मारुती, जानी वाकर, गोप,आगा,भगवान,महमूद,धूमल,असित सेन, मुकरी, राजेंद्र नाथ आदि कलाकार हुआ करते थे! इनके बिना फिल्म अधूरी ही मानी थी! फिल्मों के शौक़ीन लोग बताते है की इनके नामों से ही मन में एक आनंद का स्फुरण पैदा होता था और सहज ही हंसी आ जाती था, ऐसा नहीं है ये सीधे ही विदूषक के रूप में आये थे अपितु इनमे से कुछ पहले नायक ही रहे थे जैसे आगा और भगवान आदि! और नायकी न चलने के कारण ये भी विदूषक ही बन गए! जो आपको सिनेमा हाल की तरफ बरबस ही खींच ले जाने के लिए काफी हुआ करता था! विदूषक की भूमिका ही इनकी मुख्य भूमिका मानी जाती थी इनका और कोई काम न होकर केवल दर्शकों को हंसाना मात्र ही हुआ करता था! मतलब उस समय की फिल्मों में हंसाने का काम करने के लिए इन्हे ही रखा जाना जरूरी हुआ करता था! इनके बिना फिल्म अधूरी मानी जाती थी!
इसके बाद विलेन का जमाना आय़ा! विलेनो में प्राण,अमरीश पुरी, रणजीत,,प्रेम चोपड़ा,नरेंदर नाथ,रूपेश कुमार,शातुर्घुं सिन्हा,मदन पुरी, प्रेम नाथ,अनुपम खेर,शक्ति कपूर,कादर खान,परेश रावल जो बाद में विलेन से कुछ विदूषक और कुछ नायक बने! और तो और इनमे से कुछ तो पहले बहुत अच्छे नायक भी रहे, जैसे प्रेम नाथ ! बिना चोला बदले विदूषक के रूप में जानी लीवर का नाम लिए बिना यह शीर्षक अधूरा ही माना जाएगा!
इस बात ने साबित कर दिया की मार धाड़ की परिवृति से हंसाने का काम ही बेहतर है,क्योंकि वैसे ही जीवन में मारधाड़ क्या कम है? इस तरह पहले वाले शुद्ध विदूषको का बाजार ठंडा होगया! और बाद वाले विलेनो से विदूषक बने आज तक स्थायी विदूषक बने हुए हैं! जिन्होंने अब तक अपने चोले नहीं बदले है! और आज तक सफल भी रहे है! इनकी इन भूमिकाओं से आज के जीवन का तनाव कुछ हद तक तो कम हो जाता है! शायद यही कारण है की आजकल कई नायक अपनी भूमिका के साथ – साथ विदूषक की भूमिकाएं भी करते है! गोनिन्दा,अक्षय कुमार आदि के नाम ऐसे है!

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pitamberthakwani के द्वारा
November 28, 2012

सुषमा जी आभार !

Sushma Gupta के द्वारा
November 27, 2012

आदरणीय पीताम्बर जी ,नमस्कार ..आपने उचित कहा है ,जीवन में हंसने या खुश रहने का महत्त्व आज के तनावों -भरे जीवन में कहीं अधिक है. साभार…

deepasingh के द्वारा
November 26, 2012

आदरणीय पीताम्बर जी प्रणाम वन्देमातरम.इस सार्थक लेख पर मेरा कम शब्दों में आभार स्वीकार कीजिये.

    pitamberthakwani के द्वारा
    November 28, 2012

    सुश्री दीपा जी आपस्से जवाब पाकर धन्य हो गया ,आभार केव साथ!

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
November 22, 2012

थक्वानी जी,व्यक्ति फिल्म देखने मनोरंजन करने और तनाव को कम करने के लिए जाता है अतः यदि फिल्म में हास्य,विनोद को स्थान न हो तो फिल्म का मकसद ही ख़त्म हो जाता है.विलेन के रोल को तो सीमित ही रखना चाहिए.धन्यवाद

    pitamberthakwani के द्वारा
    November 22, 2012

    सत्य शील जी, आपकी किसी बात को कोई काट नहीं सकता आपका आभार!

yogi sarswat के द्वारा
November 21, 2012

इस बात ने साबित कर दिया की मार धाड़ की परिवृति से हंसाने का काम ही बेहतर है,क्योंकि वैसे ही जीवन में मारधाड़ क्या कम है? इस तरह पहले वाले शुद्ध विदूषको का बाजार ठंडा होगया! और बाद वाले विलेनो से विदूषक बने आज तक स्थायी विदूषक बने हुए हैं! जिन्होंने अब तक अपने चोले नहीं बदले है! और आज तक सफल भी रहे है! अभिनय ka मतलब ही यही होता है की आप को जो काम दिया जाय , वो कैसा भी हो उसे उसकी परिंती तक बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जाए !

    pitamberthakwani के द्वारा
    November 22, 2012

    योगी जी, आपका धन्यवाद

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 20, 2012

बेहतरीन

pitamberthakwani के द्वारा
November 20, 2012

प्रदीप जी, आपकी बात कैसे भी गलत नहीं है ! आपसे इसी तरह की टिप्पणी पा कर धन्य हुआ! आभार! आप मेरी अन्य पोस्ट भी देखे, तभी तो प्रोहत्साहन मिल सकेगा!

pitamberthakwani के द्वारा
November 20, 2012

मदन मोहनजी, आपको यह पोस्ट भा गयी तो मेरा प्रयास सफल हुआ! आपको साभार धन्यवाद्! आप मेरी अन्य पोस्ट पर भी अपने विचार देंगे तभी तो हम प्रोहत्साहित हो सकेंगे! आप मेरी और पोस्ट पर भी लिखने का कष्ट कर सके तो आभारी हूँगा!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 20, 2012

ये बात दीगर है की, विदूषकों की रोजी रोटी प्रभावित हुई. परन्तु मुख्य नायक भी विदूषक के रोल में सफल हैं. बधाई, सादर अभिवादन के साथ.

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 20, 2012

वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है… बधाई आपको… सादर वन्दे…


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